वुशु खिलाड़ी संतोष ने महीने में 300 रुपये खर्च कर एशियाड का कांस्य पदक झटका

जज्बे को सलाम :

नोएडा। खेलरत्न, सं : Time, 11:00, PM.
विभिन्न खेलों में खिलाड़ी को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने में लाखों रुपये खर्च करने पड़ते हैं, लेकिन एशियाड में कांस्य पदक जीतकर देश का नाम रोशन करने वाले संतोष कुमार इन खिलाड़ियों से बिल्कुल अलग हैं। परिवार की आर्थिक तंगी के कारण उन्हें वुशु के अभ्यास के लिए प्रतिदिन 10 रुपये दिए जाते थे। यानि उनका महीने का खर्च महज 300 रुपये था। अभाव के दिनों में यह खिलाड़ी हरौला से 15 किलोमीटर साइकिल चलाकर आईटीओ दिल्ली के पास अभ्यास के लिए जाता था। थकान मिटाने के लिए संतोष दो बार में 10 रुपये का शर्बत पीते थे। हरौला की तंग गलियों से एशियाड का पदक की चमक तक पहुंचना किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है।

कांस्य पदक के साथ संतोष कुमार

एशियाई खेल में जीते गए कांस्य पदक की चमक उनके लिए किसी मायने में स्वर्ण से कम नहीं है। इसमें महज उनकी कड़ी मेहनत ही नहीं बल्कि, पग-पग पर आर्थिक तंगी से लड़ाई भी शामिल है। संतोष ने 56 किलोभार वर्ग की वुशु स्पर्धा में कांस्य पदक अपने नाम किया है। ग्रेटर नोएडा के कुलेसरा में रहने वाले संतोष कुमार ने एशियाई खेल से पहले भी कई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया है। संतोष कुमार बताते हैं कि 2005-07 तक नोएडा से दिल्ली साइकिल चलाकर अभ्यास के लिए जाता था। इतने पैसे नहीं होते थे कि बस से आईटीओ तक जाया जा सके। ऐसे में साइकिल चलाकर अभ्यास के लिए जाना मजबूरी थी। मैंने हिम्मत नहीं हारी और लगातार दो साल तक इसी तरह अभ्यास किया। घर से प्रतिदिन मिलने वाले 10 रुपये से बेल का शर्बत पीता था। आईटीओ पहुंचने पर थकान मिटाने के लिए पांच रुपये का शर्बत पीता था। वहीं हरौला लौटते समय पांच रुपये शर्बत पर खर्च करता था। दोपहर में खाने के लिए रुमाल में रोटी बांधकर ले जाता था। घर की माली हालत खराब होने और खेल के अभ्यास के कारण दसवीं से आगे की पढ़ाई भी नहीं कर पाया, लेकिन कभी भी खेल से अलग होने की नहीं सोची। अब एयरफोर्स की नौकरी मिल गई है। सार्जेंट के पद पर हूं। एशियाई खेल पदक मिलने के बाद स्थिति और भी बदलने की उम्मीद है।

स्वर्ण और रजत पदक विजेता के साथ संतोष (पोडियम पर)

शुरू में संतोष का परिवार 400 रुपये किराये के मकान पर रहा
जब संतोष सब जूनियर और जूनियर वर्ग के खिलाड़ी थे तो उस समय उनका परिवार हरौला में 400 रुपये के किराये के एक कमरे में रहते थे। संतोष के साथ उनके पिता सतेंद्र कुमार, मां ऊषा देवी, भाई संदीप और बहन प्रियंका रहते थे। हरौला के बाद गाजियाबाद के राहुल विहार में भी यह परिवार किराये पर कुछ दिनों तक रहा। वर्तमान में ग्रेटर नोएडा के कुलेसरा में रह रहे हैं। अब भी परिवार के पास कोई वाहन नहीं है। पिता वर्तमान में करीब 15 हजार रुपये की नौकरी रेडिमेड गार्मेंट की फैक्ट्री में करते हैं। एक दशक पहले उनकी सैलरी 5500 थी।

प्रशिक्षक विश्वजीत और दोस्तों ने भी की मदद
विपरीत परिस्थितियों में भी परिवार ने संतोष की हरसंभव मदद की, लेकिन वह नाकाफी था। ऐसे में उनके प्रशिक्षक विश्वजीत ने भी उनकी मदद की। राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में वह मुझे आने-जाने और रहने का खर्च देते थे। जिससे मैं प्रतियोगिताओं में शामिल होकर अपनी प्रतिभा दिखा सका। दिल्ली में खेलने के दौरान संतोष अपने एक मित्र के पास कोटला में भी रहे। इस दौरान मित्र ने भी काफी मदद की। संतोष बताते हैं कि कोटला में रहने के दौरान मैंने यह कसम खाई कि जब तक कुछ बेहतर नहीं कर लेता घर नहीं जाउंगा। इसके बाद कई महीनों तक मैं घर नहीं गया। स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया से 1200 रुपये की सहायता मिली इसके बाद स्थिति में थोड़ा सुधार आया।

 

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